शनिवार, 5 जुलाई 2008
खुशी हो या गम-हिंदी शायरी
अपने ही सुर में गा रहा था
उसने कहा
‘तुम बहुत अच्छा गाते हो
शायद जिंदगी में बहुत दर्द
सहते जाते हो
पर यह पुराने फिल्मी गाने
मत गाया करो
क्योंकि इससे तुम्हारे दर्द पर
किसी को रोना नहीं आयेगा
क्यों नहीं नये गाने गाते
शोर सुनकर लोगों के
हृदय में भावनाओं का ज्वार आयेगा
ऐसे ही आंसू बहाने लगेंगे
समझ में कुछ नहीं आयेगा
तुम्हारें अंदर खुशी हो या गम
उसे बेचने का काम शुरू कर दो
क्यों कमाने से हाथ धोये जाते हो
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शनिवार, 31 मई 2008
मौत के डर बनाए जाते हैं-हिंदी शायरी
लोग बड़ी हस्ती बनने की
दौड़ में जुट जाते हैं
जो होते हैं अक्ल से लंगड़े
वह दर्शकों की भीड़ में बैठकर
ताली बजाए जाते हैं
अपने गम भुलाने के लिये
खुशियों के मनाने चैराहे पर देते धरना
आपस में झगड़ा कर वहां भी
अपने आंसू बहाये जाते हैं
देखते हैं मस्तराम ‘आवारा’
इतने ऊपर है चांद
पर उस पर लपकने के लिए
नीचे ही कई स्वांग रचाये जाते हैं
भागता आदमी जब थक जाता है
तब भी बैचेन रहता है कि
कहीं रौशनी उससे दूर न रह जाये
इसलिये अंधेरे के भय उसे सताये जाते हैं
अपने चिराग खुद ही जलाने की
आदत डाले रहते तो
क्यों गमों का गहरा समंदर
उनको डुबोये रहता
जहां जिंदगी तूफान झेलने की
ताकत रखती है
वहां मौत के डर बनाये जाते हैं
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शुक्रवार, 16 मई 2008
अपने दिल को कहाँ बहलाएँ हम-हिंदी शायरी
रास्ते में अंधेरा हो या रौशनी
हम चलते जायें पर रास्ता
होता नही कभी कम
अपनी ओढ़ी व्यग्रता से ही
जलता है बदन
जलाने लगती है शीतल पवन
महफिलों मे रौनक बहुत है
पर दिल लगाने वाले मिलते है कम
जहां बजते हैं
भगवान् के नाम पर बजते हैं जहाँ ढोल
वहीं है सबसे अधिक होती है पोल
अपने दिल को कहां बहलाएं हम
रविवार, 13 अप्रैल 2008
ख्वाहिशों में अपना दिल न लगाओ-हिंदी शायरी
उसे जंग के मैदान पर ले जातीं हैं
कभी दौलत के लिए
कभी शौहरत के लिए
कभी औरत के लिए
मरने-मारने पर आमादा आदमी
अपने साथ लेकर निकलता है हथियार
तो अक्ल भी साथ छोड़ जाती है
ख्वाहिशों के मकड़जाल में
ऐसा फंसा रहता आदमी जिंदगी भर
लोहे-लंगर की चीजों का होता गुलाम
जो कभी उसके साथ नहीं जातीं हैं
जब छोड़ जाती है रूह यह शरीर
तो समा जाता है आग में
या दफन हो जाता कब्र में
जिन चीजों में लगाता दिल
वह भी कबाड़ हो जातीं हैं
ख्वाहिशें भी एक शरीर से
फिर दूसरे शरीर में घर कर जातीं हैं
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ख्वाहिशों में अपना दिल न लगाओ
वह कभी यहां तो कभी वहां नजर आतीं हैं
एक जगह हो जाता है काम पूरा
दूसरी जगह नाच नचातीं हैं
किसी को पहुंचाती हैं शिखर पर
किसी को गड्ढे में गिरातीं हैं
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शनिवार, 12 अप्रैल 2008
दुनियादारी इसी का नाम है-हिंदी शायरी
उनके जख्म पर लगाओं मरहम
वह फिर भी दिल में बदनीयती और
बुरे इरादे लिये होते हैं
लेते हैं अच्छा नाम
केवल लोगों को दिखाने के लिये
दिल में जमाने को लूटने के
उनके अरमान होते हैं
शरीर का इलाज तो किया जा सकता
पर उनको दवा देना है बेकार
जिनके दिल में खोटी नीयत और
बेईमानी के रोग लाइलाज होते हैं
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शादी से पहले
होते हैं आशिक और माशुका
बाद में बन जाते हैं मियां-बीवी
इश्क हो जाता है हवा
दुनियांदारी इसी का नाम है
जब जरूरतों की जंग
घर को बना देती है टीवी
शुक्रवार, 21 मार्च 2008
होलिका दहन तो होता है हर साल-हिंदी शायरी
उड़ते हैं रंग और सब जगह
सजते हैं पकवानों के थाल
लोग शराब और भांग के नशे में
झूमते-झूमते हो जाते निढाल
वर्षों से जल रही हैं होलिका
पर आज के प्रह्लादों को जलाने
हर साल फिर एक नयी चादर ले आती
कहीं शराब को कर देती जहर
कहीं गाड़ियों को आपस में
टकराकर ढहाती है कहर
शराब की बोतलों और तंबाकू के
पाऊचों की चादर के नीचे ला दिए
गाँव और शहर
खेलने के लिए डाले रंग तो
धुल जाते हैं
पर जो होते इस दिन घाव वह
कर देते हैं जिन्दगी बदहाल
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शनिवार, 15 मार्च 2008
मय और जिन्दगी-हिंदी शायरी
अपने गम को भुला आते हैं
पर उतर जाता है जब नशा
तो फिर गम और ज्यादा सताते हैं
महफिलों में मय बंटती है अमृत की तरह
पीकर लोग बहक जाते हैं
जाम की कुछ बूंदों में ही
भद्र लोगों के नकाब उतर जाते हैं
देखा 'मस्तराम आवारा'' ने
दर्द कुछ देर दूर चला जाये पर
मिटा नहीं सकता कभी उसे जाम
आंतों की ऊर्जा जो जिन्दगी में
लड़ने के लिए होती है बेहद जरूरी
उसका हो जाता है काम तमाम
जिस दर्द को हवा हुआ समझते हैं
मय को पीकर
वह दिल में जमा हो जाते हैं
और फिर किसी दिन आते हैं
तूफान की तरह
आदमी की जिन्दगी को साथ ले जाते हैं
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शुक्रवार, 14 मार्च 2008
हमदर्दी की तारीख-हिंदी शायरी
अब मजाक लगता है
जिन पर जख्म होते हैं
वह उन पर रोते हैं
जब भूलते हैं तो
याद दिला कर जख्म करने वाले भी
इस दुनिया कम नहीं होते हैं
तारीखों को अब बदला जा रहा है
जिन पर हो सकता है गर्व
उनको भुलाया जा रहा है
जिन पर है सब कुछ
वह क्या जाने उनको जिन्होंने दर्द झेले हैं
समाज को बचाने की खातिर
उनके नामों को तारीखों से
हटाया जा रहा है
कभी लगता है कि
तारीख में झूठ भी लिखा जाता है
अपने हिसाब से याद दिलाया जाता है
जिसके बस में है ताकत
गरीबों के जख्मों की तारीख को
उनकी हमदर्दी दिखाने के लिए बनाया जा रहा है
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सोमवार, 10 मार्च 2008
खर्च और तोहफों का हिसाब-दो हिंदी क्षणिकाएँ
बहुत जोर-शोर से मनाया
कार्यक्रम ख़त्म होते ही
लगाने लगे हिसाब तोहफों का
तय करने में लगे रहे कि
अब उन लोगों के बच्चों के
जन्म दिन पर नहीं जायेंगे
जिनके घर से तोहफा नहीं आया
एक वर्ष का बच्चा रो-रहा था
ताकि कोई उसे पुचकार कर सुलाए
पर उसे पडी डांट
बडों की महफ़िल सजी रही
रोते-रोते बच्चा सो गया
फिर बडों ने खर्च और तोहफों का हिसाब लगाया
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उन्होने तय किया कि
मकान का मुहूर्त
बच्चे के जन्म दिन पर ही करेंगे
गृहप्रवेश पर तोहफा न देने वाले भी
बच्चे जन्म दिन पर कुछ न कुछ तो
अपने लिफाफे में भरेंगे
इस तरह से ही खर्च और तोहफों से ही
पार्टी के बजट को संतुलित करेंगे
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रविवार, 9 मार्च 2008
इज्जत तो है सिक्कों की-हिंदी शायरी
चलते रहना है जब
किसी का इन्तजार क्या करना
कहीं मिलेगी नफरत तो कहीं प्यार भी मिलेगा
कहीं होगी काँटों की चुभन
कहीं होगी फूलों की सुगंध
कोई तो निभाएगा विश्वास
कहीं धोखे भी होंगे
फिर रंग देखा क्या खुश होना
बदरंग चेहरों से क्या डरना
जो किसी का इन्तजार करेंगे
तो कोई नहीं आयेगा
पीछे रह जायेंगे हम
ज़माना आगे बढ़ जायेगा
दुनिया में फिर एक मजाक बनेंगे
चल पड़े अपनी राह पर तो
लोग देंगे पीछे से आवाज
पर चलते जाना अपनी राह
कहीं होंगे अकेले
कहीं मिलेंगे मेले
वक्त के साथ चलने की रखना चाह
भीड़ में शुमार होकर मत खोना अस्तित्व
अलग रखना व्यक्तित्व
औरों की मिसाल पर क्या गौर करना
अपनी मिसाल खुद तुम बनना
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जब तक खाली थी जेब
दोस्त ढूँढने पर भी मिले नहीं
जब से दस्तक दी है चंद सिक्कों ने दरवाजे पर
रोज कोई मिलने चला आता है
कोई दोस्त बनता है कोई भाई
नाम रिश्तों के बना जाता है
हम जानते हैं इज्जत तो है सिक्कों की
हम भला जमाने में ठहर पाते कहीं
चलता रहेगा शब्दों का मेला-हिंदी शायरी
इंटरनेट पर भी शब्दों को मेला लगेगा
कोई रोग पर लिखेगा
कोई योग पर लिखेगा
कोई भोग पर लिखेगा
कोई सहयोग पर लिखेगा
कोई संभोग अपनी माया रचेगा
कुछ लिखेंगे फूल की तरह
कुछ चुभोएँगे शूल की तरह
पढ़ने के लिए लोग भी होंगे उन जैसे
पर फिर भी सब वैसा नहीं लगेगा
भोग के लिए मन बहलाने
निकला होगा कोई शख्स ढूँढने शब्द
टकरा गया कहीं योग के शब्द तो
बदल सकता है भाव भी
आ सकता है ताव भी
पर शब्दों का खेल चलता रहेगा
पढ़ना चाहता होगा कोई संभोग पर
आ गया कोई सहयोग का उपासक शब्द
तो चाल बदल भी सकती है
साँसें भड़क भी सकती है
मस्तराम आवारा देख रहे हैं
कुछ असली है और कुछ नकली है
छद्म नाम और चेहरों का है मेला
एक नाम से दे सकता है कोई राम का सन्देश
दूसरे से भड़का सकता है काम का आवेश
कुछ पता नहीं लगेगा
चलता रहेगा इस तरह इंटरनेट पर शब्दों का मेला
जैसा गुरु होगा वैसा ही होगा चेला
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शनिवार, 8 मार्च 2008
हर सुबह को समझो नई-हिंदी शायरी
सुबह को कर अब बात नयी
जो पल बीत गया, सो बीत गया
उसे हर हाल में भूलना होगा सही
याद रखने से कोई नहीं है फायदा
वायदे निभाने का नहीं कोई कायदा
समय हमारे रुकने से तो रुक नहीं जायेगा
जो खोये रहे यादों में तो
ज़माना हमसे आगे निकल जायेगा
दिन बहुत लंबा है
पर सुबह का यह खूबसूरत पल
आज फिर वापस नहीं आएगा
इसलिए हर सुबह को समझी नई
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शुक्रवार, 7 मार्च 2008
अमन और शांति की बात-हिंदी शायरी
हमने भेजा था सुलह का पैगाम
जवाब में किया उन्होने
कलह जारी रखने का एलान
अमन की बात करो तो लोग
बेदम समझने लगते हैं
आख्नें तरेरो और चीखो तो
भागने लगते हैं
खेल में खेलते जंग की तरह
जंग लड़ते हैं हमेशा बेवजह
फिर भी मिलती शांति प्रवर्तक की उपाधि
और बहुत सारा इनाम
फिर क्यों कोई भलेमानस
कभी मानेगा शांति का पैगाम
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तुम्हारे दिल में जब आ जाये अमन
हमें खबर तत्काल खबर कर देना
तुम्हारी खैर से ही होती हमको तसल्ली
तुम्हारा दर्द कर देता बैचैन
यह भी तुम समझ लेना
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रविवार, 2 मार्च 2008
कोई आंसू नहीं पौंछेगा-हिंदी शायरी
तो और कोई और क्यों रखेगा
जो रहनी थी दिल में उस पर जग हँसेगा
हमदर्द बहुत होते हैं बहुत इस जहाँ में
पर दिल का दर्द कोई नहीं समझता
इश्क और प्यार होते हैं पल भर के
इनके धोखे में जलता है बदन बिना आग के
दिल रहता है जिन्दगी पर तडपता
जो करते हैं इश्क वह दिखाते नहीं
करते हैं प्यार वह मांगते नहीं
होश खोकर यकीन करोगे
खाओगे धोका जरूर इक दिन
औंधे मूंह गिरोगे
तुम्हारे जख्मों पर हर कोई हँसेगा
दिल लगाने की नहीं संभालने की चीज है
चंद प्यार भरे शब्दों में मत बह्को
जिन्दगी में कई बार पीछे कदम
लौटाना हो जाता है मुश्किल
अपने यकीन पर धोखा खाकर रोओगे
पर कोई आंसूं नहीं पौंछेगा
जिसे सुनाओगे दर्द वही हँसेगा
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शनिवार, 1 मार्च 2008
जमाने को दोष देते हैं-हिंदी शायरी
थे बड़ी संख्या में
करता रहा आदमी उसका शिकार
अब नहीं है तो
अब एक दूसरे को रहे हैं मार
जिन हवाओं को पीते थे पेड़-पौधे
काट-काटकर किया उनको तबाह
आदमी अब रहता है बीमार
दोष देते हैं जमाने को लोग
जबकि उनके अंदर ही हैं विकार
अपनी हालातों के लिए खुद ही ज़िम्मेदार
दूसरे को रहे हैं धिक्कार
रविवार, 17 फ़रवरी 2008
चले थे साथ-साथ-शायरी
उनको प्यार का पैगाम के लिए
पर उनके घर पर जो मंजर देखा जंग का
निकल आये वापस उल्टे पाँव लिए
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एक ही नाव पर सवार
चले नदी के उस पार
रास्ते भर वादे किये साथ साथ
जीवन भर गुजारने के लिए
जो आया किनारा
अपनी रास्ते चले दिए
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यूं तो होते हैं हर रोज हादसे
वह इसलिए नजर आते
क्योंकि हम उनसे बचकर घर आ जाते
पर जब कोई हो जायेगा हमारे साथ
उठा ले जायेगा अपने हाथ
फिर नहीं दिखाई देंगे अपनी जिन्दगी में हादसे
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