शनिवार, 5 जुलाई 2008
खुशी हो या गम-हिंदी शायरी
अपने ही सुर में गा रहा था
उसने कहा
‘तुम बहुत अच्छा गाते हो
शायद जिंदगी में बहुत दर्द
सहते जाते हो
पर यह पुराने फिल्मी गाने
मत गाया करो
क्योंकि इससे तुम्हारे दर्द पर
किसी को रोना नहीं आयेगा
क्यों नहीं नये गाने गाते
शोर सुनकर लोगों के
हृदय में भावनाओं का ज्वार आयेगा
ऐसे ही आंसू बहाने लगेंगे
समझ में कुछ नहीं आयेगा
तुम्हारें अंदर खुशी हो या गम
उसे बेचने का काम शुरू कर दो
क्यों कमाने से हाथ धोये जाते हो
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शुक्रवार, 16 मई 2008
अपने दिल को कहाँ बहलाएँ हम-हिंदी शायरी
रास्ते में अंधेरा हो या रौशनी
हम चलते जायें पर रास्ता
होता नही कभी कम
अपनी ओढ़ी व्यग्रता से ही
जलता है बदन
जलाने लगती है शीतल पवन
महफिलों मे रौनक बहुत है
पर दिल लगाने वाले मिलते है कम
जहां बजते हैं
भगवान् के नाम पर बजते हैं जहाँ ढोल
वहीं है सबसे अधिक होती है पोल
अपने दिल को कहां बहलाएं हम
रविवार, 30 मार्च 2008
फूलों की खुशबू से नहीं महकता चमन-हिंदी शायरी
दिन रात घर में अपने बडों को
इंसानों से जो खेलते देखते
बड़े भी क्या सिखाएं छोटों को
अपने बडों से ही सीखे क्या
बस जिन्दगी एक नौकरी या व्यापार
जिसमें समेटो दौलत और शौहरत अपार
जमाने के बिगड़ जाने की शिकायत में
करते हैं अपना वक्त बरबाद लोग
अपने चाल, चरित्र अपने चेहरे नहीं देखते
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फूलों की खुशबू से नहीं महकता चमन
आदमी के मन में बसी है
बस कुछ पाने की ख्वाहिश
नहीं चाहता अमन
अंधी दौड़ में भाग रहा हैं
अपने दिल और शरीर का करता है दमन
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शनिवार, 22 मार्च 2008
इंसान यूं ही चलता जाता-हिंदी शायरी
कुछ होते हैं अफ़साने
जिन्दगी का कारवां बढ़ता जाता
जिनसे करते हैं खुशी की उम्मीद
वही दे जाते हैं धोखा
गैरों से ही तब आसरा मिल जाता
अपनों के बीच गुजाते फिर भी जिन्दगी
चाहे कोई भरोसा नजर नहीं आता
मन पर मजबूरियों का बोझ उठाये
इंसान यूं ही चलता जाता
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ढकोसलों को कहते हैं पूजा
मानते हैं एक को घर ढूँढें दूजा
आदमी का दिल भटकता है इधर उधर
इतनी बड़ी देह फिर भी लगता चूजा
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शुक्रवार, 21 मार्च 2008
होलिका दहन तो होता है हर साल-हिंदी शायरी
उड़ते हैं रंग और सब जगह
सजते हैं पकवानों के थाल
लोग शराब और भांग के नशे में
झूमते-झूमते हो जाते निढाल
वर्षों से जल रही हैं होलिका
पर आज के प्रह्लादों को जलाने
हर साल फिर एक नयी चादर ले आती
कहीं शराब को कर देती जहर
कहीं गाड़ियों को आपस में
टकराकर ढहाती है कहर
शराब की बोतलों और तंबाकू के
पाऊचों की चादर के नीचे ला दिए
गाँव और शहर
खेलने के लिए डाले रंग तो
धुल जाते हैं
पर जो होते इस दिन घाव वह
कर देते हैं जिन्दगी बदहाल
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शुक्रवार, 14 मार्च 2008
हमदर्दी की तारीख-हिंदी शायरी
अब मजाक लगता है
जिन पर जख्म होते हैं
वह उन पर रोते हैं
जब भूलते हैं तो
याद दिला कर जख्म करने वाले भी
इस दुनिया कम नहीं होते हैं
तारीखों को अब बदला जा रहा है
जिन पर हो सकता है गर्व
उनको भुलाया जा रहा है
जिन पर है सब कुछ
वह क्या जाने उनको जिन्होंने दर्द झेले हैं
समाज को बचाने की खातिर
उनके नामों को तारीखों से
हटाया जा रहा है
कभी लगता है कि
तारीख में झूठ भी लिखा जाता है
अपने हिसाब से याद दिलाया जाता है
जिसके बस में है ताकत
गरीबों के जख्मों की तारीख को
उनकी हमदर्दी दिखाने के लिए बनाया जा रहा है
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मंगलवार, 11 मार्च 2008
दिल की बहियों से नाता तोड़ लिया है-हिंदी शायरी
पर फिर भी रिश्तों की खुशबू से
क्यों नहीं महकते हैं
अपने लिए ही जी रहा है हर कोई
दूसरे के दर्द का किसी को नहीं होता अहसास
छत पर नहीं डालते दाना
फिर भी भूखे ही पक्षी चहकते हैं
करते हैं सब लोग एक दूसरे के
वफादार होने की कोशिश
मौका पड़ने पड़ने पर
नदारत रहते हैं
अब कोई नकाब नहीं लगाता चेहरे पर
अदाओं से ही सभी अभिनय करते हैं
अपने अकेलेपन को सब जानते हुए भी
लोग दिलाते हैं यकीन सहारे का खुद
दूसरों से उम्मीद के वहम भी अच्छी लगते हैं
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हमने रात को तकिया रखकर सोना छोड़ दिया है
दूसरों के भरोसे से मुहँ मोड़ लिया है
वफ़ा और धोखे के हिसाब कौन रखे
अपने दिल की बहियों से नाता तोड़ लिया है
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सोमवार, 10 मार्च 2008
खर्च और तोहफों का हिसाब-दो हिंदी क्षणिकाएँ
बहुत जोर-शोर से मनाया
कार्यक्रम ख़त्म होते ही
लगाने लगे हिसाब तोहफों का
तय करने में लगे रहे कि
अब उन लोगों के बच्चों के
जन्म दिन पर नहीं जायेंगे
जिनके घर से तोहफा नहीं आया
एक वर्ष का बच्चा रो-रहा था
ताकि कोई उसे पुचकार कर सुलाए
पर उसे पडी डांट
बडों की महफ़िल सजी रही
रोते-रोते बच्चा सो गया
फिर बडों ने खर्च और तोहफों का हिसाब लगाया
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उन्होने तय किया कि
मकान का मुहूर्त
बच्चे के जन्म दिन पर ही करेंगे
गृहप्रवेश पर तोहफा न देने वाले भी
बच्चे जन्म दिन पर कुछ न कुछ तो
अपने लिफाफे में भरेंगे
इस तरह से ही खर्च और तोहफों से ही
पार्टी के बजट को संतुलित करेंगे
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शनिवार, 8 मार्च 2008
बेवफाई के नहीं होते वार-हिंदी शायरी
नीचे खड़ी गरीबों से खौफ खाते हैं
संभाल सके लोगों की भीड़ को
तमाम तरह के बहाने गढ़कर
ऐसे दलालों के सहारे लिए जाते हैं
बनते हैं लोग अपनी अलग-अलग पहचानों में
लड़ने की बात सामने आये तो
छिप जाते हैं अपने-अपने खानों में
भ्रम फैलाने वाले मुद्दों पर
सब बहस किये जाते हैं
और समाज के शिखर पर
पीढियों के नाम लिख जाते हैं
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मोहब्बत है नाम पर धोखे हजार
फिर भी खाते हैं बार -बार
अगर आँखें होती तो
नाम मोहब्बत नहीं होता
बेवफाई के नहीं होते वार
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रविवार, 2 मार्च 2008
मोहब्बत और तोहफे-हिंदी शायरी
तोहफों को ही लोग मोहब्बतों का सबूत माने
इश्क और प्यार पर लिख कर चंद शेर
शायरों ने खूब नाम कमाया
आशिकों ने भी उनका रीमिक्स खूब गाया
पर तोहफों के बेचने वाले सौदागरों ने
इस पर खूब नामा कमाया
आशिकों की जेब हुई खाली तो क्या
इससे बदले नहीं मोहब्बत के मायने
जमाना बदला पर बदली नहीं मोहब्बत
आंखो के इशारे से मोहब्बत इजहार करने की जगह
आया ख़त लिखने का ज़माना
ख़त से टेलीफोन और
फिर आया मोबाइल का ज़माना
अब तो खुला है बाजार
खुल कर करो मोहब्बत
बदनामी से कौन डरता है
जो डर गया उसे लोग जवान बूढा माने
पहले बाजार में मोहब्बत
करने वाले डरते थे
अब खुले में लगे हैं अपने जजबात दिखाने
मोहब्बतों के तोहफों का विज्ञापन होता है
सिमट गयी है मोहब्बत औरत-मर्द के इर्द-गिर्द
मासूम और गरीब तो है हाशिये पर
मोहब्बत हैं वही जिसे ज़माना नहीं बाजार माने
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शनिवार, 1 मार्च 2008
आखें खुलीं हैं, पर बंद हैं नजर-हिंदी शायरी
चारों तरफ रास्ता आता है नजर
सभी दौडे जा रहे हैं
अपने मुकाम का पता किससे पूछूं
सभी हैं बदहवास और दर-ब-दर
कोई उठाकर नहीं देखता नजर
भीड़ में सब हैं अकेले
जा रहे हैं सब इसलिए जाते हैं
इस उम्मीद में कहीं तो होंगें
दौलत के मेले
कहीं चूक न जाएं कुछ पाने से
इसलिए हैं सबकी रास्ते में आगे ही नजर
बरसों से लोग दौड़ रहे हैं
अपनी मंजिल का पता नहीं
पर कोई और न ले जाये कुछ कहीं
हम पहले झपट लें मौका
ऐसी है सबकी नजर
पर किसने पाया
कोई क्या ले गया
सब टूटे-बिखरते जिंदा आते हैं नजर
बोलते सब हैं, पर निरर्थक शब्द
अक्ल से परे हैं, सोचते कुछ नहीं
आखें खुलीं है, पर बंद है नजर
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जमाने को दोष देते हैं-हिंदी शायरी
थे बड़ी संख्या में
करता रहा आदमी उसका शिकार
अब नहीं है तो
अब एक दूसरे को रहे हैं मार
जिन हवाओं को पीते थे पेड़-पौधे
काट-काटकर किया उनको तबाह
आदमी अब रहता है बीमार
दोष देते हैं जमाने को लोग
जबकि उनके अंदर ही हैं विकार
अपनी हालातों के लिए खुद ही ज़िम्मेदार
दूसरे को रहे हैं धिक्कार
शुक्रवार, 29 फ़रवरी 2008
अपना बजट तो होता है कड़वे सत्य पर आधारित-हिंदी शायरी
इतना उलझ जाते हैं
किसी और के बजट पर
सोच ही कहाँ पाते हैं
दाल, गेहूँ ,चावल, नमक और शक्कर
इनके इर्द-गिर्द ही चलता है अपना चक्कर
रेल में तो कभी कभार जाते हैं
घर के खेल में उलझे होते हैं ऐसे कि
देश के अर्थ के बजट से कभी अपने अर्थ
जोड़ने की तो फुरसत ही कहाँ पाते हैं
अपना बजट तो होता है
कड़वा सत्य पा आधारित
आंकडों से सजे बजट
हम समझ कहाँ पाते हैं
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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2008
जीवन भी आखिर कबाड़ हो जाता है-हिंदी शायरी
तब प्रार्थना करते हुए याचना करते हैं
अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए
भरोसा नहीं है उस परमात्मा पर
जिसने जीवन जीने के लिए
इतने कीमती पल दिए
देह के हर अंग में
बख्शी है वह ताकत
जो हर चीज हासिल कर सके इंसान
कभी न हो बेईमान
पर फिर भी आदमी
पूरी जिन्दगी गुजार देता है
अपने पाँव परमात्मा के घर चक्कर लगाते हुए
हाथ उठाकर मांगते हुए
मन आंखों से अपने प्रयत्नों से
एकत्रित सामान को देखते हुए
भूल जाता है वह अपना कर्तव्य
यहाँ जीना है उसे सबके लिए
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बडे प्रयत्नों से जुटाया हुआ सामान भी
कभी कबाड़ हो जाता है
क्या सोचकर जुटाते हैं सब
अपना खून पसीना क्या
इसी कबाड़ को एकत्रित कर गुजारेंगे
अपने सारे कीमती पल इसके लिए बिगाडेंगे
ऐसा करते हुए हमारा अपना जीवन भी
आखिर कबाड़ का घर हो जाता है
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बुधवार, 27 फ़रवरी 2008
जो अपने थे कभी अजनबी हो जाते हैं-हिंदी शायरी
दिल में खिल रहा है खुशी का चमन
कभी घेर लेता है तनावों का सिलसिला
पर किससे और क्यों करें कोई गिला
अपनी ही गलतियों का जिम्मा लोग
डालते हैं दूसरों पर
क्या यकीन करेंगे हम पर
हमारे गम पर लोग हँसते हैं
खुशी देख कर जलते हैं
इसलिए अच्छा है हम रखें अमन
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चेहरे नहीं बदलते पर लोगों के
कभी दिल बदल जाते हैं
यह आदमी नहीं वक्त का खेल है कि
जो अपने थे कभी अजनबी हो जाते हैं
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मंगलवार, 26 फ़रवरी 2008
जमाने को बदलने की बात कौन करेगा-हिंदी शायरी
परिश्रम कोई क्यों करेगा
तोड़ने की आवाजें
बुलंद होती हैं जहाँ
रचना का विचार कौन करेगा
खिलवाड़ होता हो भावनाओं का
किसी का कोई हमदर्द कोई क्यों बनेगा
ए जमाने को दोष देने वालों
तुम भी इसका हिस्सा हो
और ज़माना कोई चार पैर वाला पशु नहीं
जब तुम भी उसकी राह चलते हो
उसको बदलने की बात कौन करेगा
सोमवार, 25 फ़रवरी 2008
दिल के दर्द को और बढ़ा दिया-हिंदी शायरी
तो अपनी शर्तों का पुलिंदा थमा दिया
हमने उनसे माँगा था दर्द उनका दर्द
उन्होने बाहर जाने का रास्ता दिया
पर भी वह खुश नहीं रह सके
अपने दर्दों से वह तड़पते रहे
किसी ने उनका हाल पूछा नहीं
चीखते रहे बहरी दीवारों की पीछे
हमारे दिल के दर्द को और बढा दिया
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मेकअप से उनका सौंदर्य
कितना निखर आता है
पर पसीने की थोडी बूँदें भी
उनकी असलियत बयान कर देतीं हैं
जिसमें वह बह जाता है
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एक सच छिपाने की लिए
कितने झूठ बोले जाते हैं
पर भी सच का रास्ता नहीं रोक पाते हैं
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रविवार, 24 फ़रवरी 2008
कौन सुनेगा संदेश(हिन्दी शायरी)
नगर से महानगर
महानगर से विदेश
भागता जाता है आदमी
मन में लिए आवेश
एक से दस खुशी चाहता है
नहीं जानता उसका वेश
अनंतकाल तक खुश रहने की
ख्वाहिश लिए आदमी हो जाता है दरवेश
कान है पर सुनता नहीं
आँख है पर देखता नहीं
अक्ल पर डाल रखा है
लोभ और लालच का परदा
किसे सुनाएँ और कौन सुनेगा
'संतोषी सदा सुखी' का संदेश
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जो बाजार में बिकता है
वही अच्छा लिखता है
यही सच्चाई है
कोई पढता हो या नहीं
मगर अखबार आप आदमी
खर्चा तो करता है
और उसमें छपा ही तो सभी को दिखता है
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शनिवार, 23 फ़रवरी 2008
अन्तरिक्ष में मकड़जाल बनाया-हिन्दी हास्य शायरी
जमीन पर बरसाया बारूद
अब जंग को आसमान में भी पहुंचाया
नाभिकीय हथियारों से
अन्तरिक्ष को भी सजाया
आदमी नहीं मिलता तो
अपनी दानव मशीन को
अपने ही हथियार से उडाया
पहले दानव जैसी मशीने बनाते
फिर उनको दुश्मन बताते
और फिर दानव नाशक देवता बन जाते
जूठ को प्रमाणित सत्य बनाया
मगर सच भला कहाँ छिपता है
हजार पहरों से भी बाहर दिखता है
कौन जला रहा है धरती की प्राण वायु को
कौन घटा रहा है हरियाली की आयु को
बारूद से इंसानियत की रक्षा करने की
ख्वाहिश जताते हैं वह लोग
जिन्होंने अब अन्तरिक्ष में दानव बसाया
दाएं देखो या बाएँ
जो दानव हैं वही देवताओं का चोला पहने हैं
बंदूके और मिसाइलें उनके गहने हैं
चेहरे पर हैं कुटिल मुस्कान
दूसरे को घाव देने में समझते शान
ऐसे दुश्मन का पता देते हैं
जिस कोई नहीं पाता जान
कहाँ आयेंगे अब देवता इस धरती पर
अन्तरिक्ष से धरती पर इन दानवों ने
जासूसी का जाल बिछाया
दावा यह कि अपने इलाके को बचाया
इस आड़ में दानवों ने ही अपना राज बनाया
अपने घर भरने के लिए रक्षा की बात करते
रोटी का कोई हिसाब नहीं करते
क्योंकि इससे उनके महल नहीं सजते
देते हैं दुनिया को धोखा
डरे सहमें लोग क्या किसी की रक्षा करेंगे
उन्होने तो बस हवा में इन्द्रजाल बनाया
लोग न देख सकें जहाँ अन्तरिक्ष में
वहाँ अपना मकड़जाल बनाया
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पाने की इच्छा को कहते विश्वास-हिन्दी शायरी
ओटने लगते कपास
भजन करते हुए भोजन की आस
जब भूख और भय में घिर जाता इंसान
भ्रष्ट हो जाता है भले हो महान
देह की भूख का भजन से कोई वास्ता नहीं
भजन से रोटी की तरफ कोई
जाता रास्ता नहीं
फिर भी भजन करते लोग
लगाए भोजन की आस
जिनके पेट भरे हैं वह भी
और रोटी की करते आस
मुहँ में हरि का जपते नाम
मन में हरे पते का रटते नांम
पाने कि इच्छा को कहते विश्वास
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