रविवार, 4 नवंबर 2007

घट-घट में बसे राम, यही है उनके होने का प्रमाण

आए दिन भगवान् श्री राम के होने या न होने के प्रमाण पर कहीं न कहीं चर्चा होती है। भगवान् श्री राम पर अनेक ग्रंथ लिखे गए है पर उनके अस्तित्व के भौतिक प्रमाण लोगों को चाहिए। शायद कुछ लोग चाहते हैं उनके वस्त्र या आभूषण या कोई अन्य वस्तु हाथ लग जाये। मजे की बात यह है कि जिन्हें भजना है बिना किसी प्रमाण के भजे जा रहे हैं-उन्हें किसी प्रमाण की आवश्कता नहीं महसूस होती। मुश्किल यह है कि भारत के लोग अपने देश के ही महापुरुषों को पूजते हैं और भगवान् श्री राम और श्रीकृष्ण और श्री शिवजी की लीलाएं ऐसी रहीं है कि लोग उन्हीं जनचर्चाओं के माध्यम से जीवित रखे हुए हैं। इतना ही नहीं भगवान् श्री राम और कृष्ण और श्री शिवजी की मूर्तियों की पूजने वाले फिर किसी और का रुख नहीं करते क्योंकि इनकी मूर्तियों में जीवन्तता की अनुभूति होती है। मेरा मानना है कि आदमी का मन ही शक्तिशाली होता है और उसमें जैसा इष्ट होता है वैसा ही उसका चरित्र होता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि बचपन से ही भक्ति करने वाले बुढापे में भी भक्ति कर पाते हैं। मैं बचपन से इन भगवान् श्री राम, श्री कृष्ण और श्री शिवजी की मूर्तियों की पूजा करता आया हूँ और मेरी यह आदत बन गयी है

इस देश में श्री गुरु नानक जी और श्री कबीर जी जैसे महान संत भी हुए और इनका दर्जा भारतीय समाज में है वह सब जानते हैं। मुशिकल यह है कि अब इस देश में किसी ऐसे वैसे को भगवान् माने यह संभव नहीं है पर कुछ लोग भगवान् की तरह समाज में पुजना चाहते हैं तो कुछ लोग ऐसे भी हैं जो स्थापित देवताओं को मिथक साबित करना चाहते हैं-इसके पीछे उनका उद्देश्य यह होता है की किसी भी तरह अपने को विद्वान साबित करें । यही कारण है देश के कई प्रतिष्ठित लोगों के देहावसान पर उनकी समाधि बना दी जाती है और वहाँ कार्यक्रम किये जाते हैं। बहुत प्रचार होने के बाजूद सामान्य लोग उन्हें भगवान् नहीं मानते और मत्था टेकने नहीं जाते-क्योंकि उन्हें अपने मन में जीवन्तता पैदा करने वाली अनुभूति चाहिऐ होती है।

कुछ विद्वान लोग बहुत परेशान हैं कि अगर यह समाज पूजा के मामले में बदलता क्यों नहीं? जिन लोगों को समाज में बदलाव करने का शौक है वह यहीं आकर मात खा जाते हैं।

सच्ची बात यह है यह समाज सत्य, त्याग और परोपकार की राह पर चलने वालों को ही मानता है और उनके देहावसान को परमधाम गमन कहता है इसलिए जिनमें जीवन्तता की अनुभूति होती है उन्हें ही पूजता है। भौतिक देह और वस्तुओं का नाश होता है यह समाज जानता है इसलिए अपने किसी भगवान् का प्रकट दिवस तो मनाता है पर किसीकी पुण्य तिथि नहीं मनाता-क्योंकि वह उनके प्रति आत्मिक भाव रखता है। इस समाज की यह स्थाई मान्यता है कि महापुरुष अपनी भौतिक देह जो पांच तत्वों से बनी हैं वह चोले की तरह छोड़कर अपने परमधाम जाते हैं।

इसलिए भगवान् श्री राम के काल में उनके बाद उनके अस्तित्व का प्रमाण बचाए रखने की कोशिश की होगी यह संभव नहीं है। फिर आंधी, तूफ़ान और भूकंप जाने क्या-क्या निगल चुके हैं और जिस परमात्मा ने इन्हें रचा है अपना कहर बर्पाते समय यह नहीं देखते कि यह उनके आने का कोई प्रमाण है और उसे छोड़ दिया जाये। इसके अलावा भगवान् श्री राम लोगों में मन में इष्ट की तरह जीवंत बने हुए तो उन्होने उनके अस्तित्व बनाये रखने का कोई प्रयास भी किया होगा यह लगता नही है। उनके होने का अस्तित्व का प्रमाण तो तब दिया जाये जब इस समय वह न हों-वह तो हर देशवासी के घट-घट में बसे हैं।

4 टिप्‍पणियां:

मिहिरभोज ने कहा…

जय श्री राम,राम के बिना हिंदुस्तान की कल्पना भी नहीं की जा सकती है,और आश्चर्य तो ये है कि हे राम कहकर प्राण त्यागने वाले बापू के तथाकथित भक्त ये कर रहे है,बहुत यअच्छा लिखा साधुवाद

Udan Tashtari ने कहा…

उनके होने का अस्तित्व का प्रमाण तो तब दिया जाये जब इस समय वह न हों-वह तो हर देशवासी के घट-घट में बसे हैं।


--सत्य वचन.

Udan Tashtari ने कहा…

उनके होने का अस्तित्व का प्रमाण तो तब दिया जाये जब इस समय वह न हों-वह तो हर देशवासी के घट-घट में बसे हैं।


--सत्य वचन.

Madhu ने कहा…

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